Company Logo

Vanshika

kumarivanshika01232@gmail.com
WEFRU9450291115202
Scan to visit website

Scan QR code to visit our website

Blog by Vanshika | Digital Diary

" To Present local Business identity in front of global market"

Meri Kalam Se Digital Diary Submit Post


भारतेंदु हरिश्चंद्र


"मैं आज आपको भारतेंदु हरिश्चंद्र के बारे में बताना चाहती हूं" आधुनिक हिंदी साहित्य के प्रवर्तक और खड़ी बोली के जनक कहे जाने वाले भारतेंदु हरिश्चंद्र का जन्म सन 1850 में काशी के एक संपन्न वैश्य परिवार में हुआ था इनके पिता बाबू गोपाल चंद्र की गिरधर दास के उपन्यास से कविता लिखा करते थे अल्पायु में ही माता-पिता का सैया इनके सर से उठ गया और घर का सारा भोज उनके कंधों पर आप पढ़ाई इन्होंने हिंदी... Read More

"मैं आज आपको भारतेंदु हरिश्चंद्र के बारे में बताना चाहती हूं"

आधुनिक हिंदी साहित्य के प्रवर्तक और खड़ी बोली के जनक कहे जाने वाले भारतेंदु हरिश्चंद्र का जन्म सन 1850 में काशी के एक संपन्न वैश्य परिवार में हुआ था इनके पिता बाबू गोपाल चंद्र की गिरधर दास के उपन्यास से कविता लिखा करते थे अल्पायु में ही माता-पिता का सैया इनके सर से उठ गया और घर का सारा भोज उनके कंधों पर आप पढ़ाई इन्होंने हिंदी मराठी बांग्ला संस्कृति आदि भाषाओं का ज्ञान घर पर ही प्राप्त किया

 13 वर्ष की अल्पायु में ही बन्नो देवी से इनका विवाह हुआ विवाह के बाद 15 वर्ष की अवस्था में इन्होंने जगन्नाथ पुरी की यात्रा की यही से उनके मन में साहित्य सृजन के अंकुर फूटे इन्होंने अपने साहित्य जीवन में अनेक पत्र पत्रिकाओं का संपादन किया और बनारस में एक कॉलेज की स्थापना की उनके अतिरिक्त इन्होंने हिंदी साहित्य की समृद्धि के लिए अनेक सभा संस्थाओं की स्थापना भी की उन्होंने न केवल हिंदी साहित्य की सेवा वरुण शिक्षा के प्रसार के लिए धन जट आया और दीन दुखियों की भी सहायता की उनकी इसी दम सेल्टा की प्रवृत्ति के कारण इनका छोटा भाई संपत्ति का बंटवारा करके इसे अलग हो गया इस घटना का भारतेंदु के जीवन पर विपरीत प्रभाव पड़ा और इन्हें अनेक कष्ट झेलना पड़े यह श्रेणी हो गए और 35 वर्ष की अल्प आयु में इन्होंने 175 ग की रचना करके हिंदी साहित्य की महत्व सेवा की सन 1885 में 35 वर्ष की अल्प आयु में इनका निधन हो गया

 इस प्रकार हम देखते हैं कि भारतेंदु हरिश्चंद्र एक साथ ही प्रतिभा संपन्न कवि नाटककार पत्रकारों निबंधकार थे अपने अल्प जीवनकाल में ही इन्होंने इतना महत्वपूर्ण कार्य किया कि इनका योग भारतेंदु युग के नाम से विख्यात हो गया प्रस्तुत यह हिंदी साहित्य गगन के इंदु ही थे हिंदी भाषा और साहित्य के क्षेत्र में भारतेंदु के भविष्यवाणी योगदान पर प्रकाश डालते हुए सुविख्यात पाशचातय साहित्यकार गिरि शरण ने उचित ही लिखा है हरिश्चंद्र ही एकमात्र ऐसे सर्वश्रेष्ठ कवि है जिन्होंने अन्य किसी भी भारतीय लेखक की अपेक्षा देसी बोली में रचित साहित्य को लोकप्रिय बनाने में सर्वाधिक योगदान दिया

 स्पष्ट है कि भारतेंदु हरिश्चंद्र एक प्रतिभा संपन्न अप युग परिवर्तन साहित्यकार थे नव वर्ष की छोटी आयु में ही है कविताएं लिखने लगे थे अपने इसी विश्लेषण प्रतिभा का परिचय देते हुए इन्होंने हिंदी साहित्य के विकास में उन्मूलन योगदान दिया केवल 18 वर्ष की आयु में इन्होंने कवि वचन सुधा नामक पत्रिका का संपादन एवं प्रकाशन प्रारंभ किया इसके कुछ वर्षों पश्चात इन्होंने हरिश्चंद्र मैगजीन का संपादन एवं प्रशासन भी प्रारंभ कर दिया

 भारतेंदु हरिश्चंद्र अध्यपी कुशल निबंधकार भी थे फिर भी नाटक है कविता के क्षेत्र में ही उनकी प्रतिभा का सर्वाधिक विकास हुआ यह अनेक भारतीय भाषाओं में कविताएं करते थे किंतु ब्रज भाषा पर इनका विशेष अधिकार था मातृभाषा हिंदी के प्रति उनके हृदय में आघात प्रेम था हिंदी साहित्य को समृद्धि बनाने के लिए इन्होंने न केवल स्वयं साहित्य का सृजन किया वरन अनेक लेखकों को भी इन्होंने यह कहकर इस दिशा में परिवर्तित किया

 निजी भाषा उन्नति आहे सब उन्नति को मूल 

 बीनू निज भाषा ज्ञान के मिठे न किए को शुल

 भारतेंदु जी की बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण यही है कि उन्होंने कविता नाटक निबंधकार इतिहास आदि विश्व पर अनेक पुस्तकों को की रचना की भक्ति सर्वस्व भक्ति भावना पर आधारित उनकी वर्ष भाषा में लिखी प्रसिद्ध पुस्तक है इसके अतिरिक्त प्रेम माधुरी प्रेम तरंग प्रेमांशु वृषण दान लीला प्रेम सरोवर तथा कृष्ण चरित्र भक्ति तथा दिव्य प्रेम की भावनाओं पर आधारित रचनाएं हैं इसमें श्री कृष्ण की विविध लीलाओं का सुंदर वर्णन हुआ है

 विच अन्य विजय पताका भारत वीरता विजय वल्लरी आदि इसके द्वारा रचित देश प्रेम की प्रमुख रचनाएं है बंदर सभा और बकरी विलाप में इनकी हास्य व्यंग्य शैली के दर्शन होते हैं वैदिकी हिंसा हिंसा न भक्ति सत्य हरिश्चंद्र चंद्रावली भारत दुर्दशा नीला देवी और अंधेर नगरी आदि उनकी बहुत प्रसिद्ध नाती ये रचनाएं हैं अंधेर नगरी तो हिंदी नाट्य साहित्य में मिल का पत्थर सिद्ध हुआ पूर्ण प्रकाश तथा चंद्रप्रभा भारतेंदु द्वारा रचित सामाजिक उपन्यास है 

 कश्मीर कुसुम महाराष्ट्र देश का इतिहास रामायण का समय अग्रवालों की उत्पत्ति बूंदी का राजवंश तथा चरित्र वाली में इन्होंने भारतीय इतिहास एवं पुरातत्व सम्यक विवेचन प्रस्तुत किया है कवि वचन सुधा हरिश्चंद्र मैगजीन या हरिचंद चंद्रिका आदि पत्रिकाओं का सफल संपादन इनके निष्णात्मक पत्रकार होने का स्पष्ट प्रमाण है

 धन्यवाद -


Read Full Blog...

  • Author:- kumarivanshika01232@gmail.com
  • Date:- 2026:01:19
  • 35 Views


रहीम के जीवन के बारे में


" मैं आज आपको प्रसिद्ध अब्दुल रहीम खान खान के बारे में बताना चाहती हूं" नीति के दोहों के लिए प्रसिद्ध रहीम दास का पूरा नाम रहीम खान खान था इनका जन्म सन 1556 ईस्वी में लोहार नगर अब पाकिस्तान में हुआ था यह अकबर के संरक्षक बेरमखा के पुत्र थे किन्हीं कर्म से अकबर और बेरमखा में मतभेद हो गया अकबर ने बेरमखा पर विरोध का आरोप लगाकर भेज दिया; मार्ग में ही शत्रु मुबारक खा ने उनकी हत्या कर दी बेरमखा... Read More

" मैं आज आपको प्रसिद्ध अब्दुल रहीम खान खान के बारे में बताना चाहती हूं"

नीति के दोहों के लिए प्रसिद्ध रहीम दास का पूरा नाम रहीम खान खान था इनका जन्म सन 1556 ईस्वी में लोहार नगर अब पाकिस्तान में हुआ था यह अकबर के संरक्षक बेरमखा के पुत्र थे किन्हीं कर्म से अकबर और बेरमखा में मतभेद हो गया अकबर ने बेरमखा पर विरोध का आरोप लगाकर भेज दिया; मार्ग में ही शत्रु मुबारक खा ने उनकी हत्या कर दी बेरमखा की हत्या के उपरांत अकबर ने रहीम और उनकी माता को अपने पास बुला लिया तथा उनके पालन पोषण एवं शिक्षा का उचित प्रबंध किया अपनी प्रतिभा के द्वारा इन्होंने हिंदी संस्कृत अरबी फारसी तथा तुर्की भाषाओं का कक्षा ज्ञान प्राप्त कर लिया रहीम अकबर के दरबार के नवरत्न में से एक थे यह अकबर के प्रधान सेनापति और मंत्री भी थे यह एक वीर योद्धा थे और बड़े कौशल से सेवा का संचालन करते थे उनकी दानशीलता की अनेक कहानियां प्रचलित है

 अरबी तुर्की फारसी तथा संस्कृत के  यह पंडित है हिंदी काव्य के यह ममृज्ञ थे और हिंदी कवियों का बड़ा सम्मान करते थे गोस्वामी तुलसीदास से भी इनका परिचय तथा स्नेहा संबंध था 

 वीर योद्धा होने पर भी रहीम अपने नाम के अनुरूप दयाल प्रकृति के थे इनका स्वभाव अत्यंत मृदु और कोमल था उच्च पदों पर रहते हुए भी इनका घमंड छू तक नही गया था यह योग्यता के पारखी  थे मुसलमान होते हुए भी यह श्री कृष्ण के भक्त थे यह बड़े दानी उदार और सहृदय  थे अपने जीवन के संघर्ष से इन्होंने बहुत कुछ सीखा इन्हें संसार का बड़ा अनुभव था अकबर की मृत्यु के पश्चात जहांगीर के सिंहासन पर बैठते ही इन्हें चित्रकूट में नजर बंद कर दिया गया इस अवस्था में भी जब एक ब्राह्मण अपनी पुत्री के विवाह के लिए धन लेने इनके पास पहुंचा तो उसकी दैनिक स्थिति पर रहीम का हृदय भर आया और उन्होंने यह दुहा लिखकर ब्राह्मण को दिया और उसे रीवा नरेश  के पास भेज दिया

 चित्रकूट में रमी रहे, रहिमन अवध नरेश

 जा पर विपदा परत है, सब आवे इही देश 

 इस दोहे को पढ़कर रीवा नरेश ने उसे ब्राह्मण को यथेष्ट धन दे दिया रहीम का अंतिम समय विपत्तियों से गिर रहा इन्हीं विपत्तियों से संघर्ष करते हुए यह अमर कवि अपना पार्थिव शरीर छोड़कर सन 1627 में गोलोक वासी हो गए रहीम बड़े लोग प्रिय कवि थे उनके नीति के दोहे तो सब धारण की जिन्ना पर रहते थे उनके दोहे में करी नीति की निशान नहीं है उसमें ममिता तथा कई हर दिए की सच्ची स्वीडन भी मिलती है दैनिक जीवन की अनुभूतियों पर आधारित दृष्ट धातु के माध्यम से इनका कथन सीधे हृदय पर चोट करता है उनकी रचना में रीति के अतिरिक्त भक्ति तथा श्रृंगार कीजिए सुंदर व्यंजना हुई है 

 रहीम जनसाधारण में अपने दोहों के लिए प्रसिद्ध है परंतु इन्होंने कवित सेवाएं सोरठा तथा बेरवा छंदों में भी सफल काव्य रचना की है रहीम का ब्रिज और अवधि भाषण पर सामान अधिकारिता खड़ी बोली में भी उन्होंने कविताएं लिखकर अपनी प्रतिभा को प्रमाणित किया उनकी भाषा सरल स्पष्ट तथा प्रभावपूर्ण है जिसमें बुर्ज खड़ी बोली संस्कृत अरबी फारसी तथा तुर्की आदि भाषाओं के शब्दों का सहज स्वाभाविक प्रयोग दृष्टिगत होता है पुराने सहित अनेक शास्त्रों का ज्ञान होने के करण संस्कृत की तत्सम शब्दावली का इन्होंने खूब प्रयोग किया अपने शास्त्र ज्ञान के कारण ही यह मानवीय भावनाओं से हॉट स्रोत नीति युक्त काव्य की रचना करने में सफल रहे रहीम सतसई अपने नीति परत उपदेश आत्मक दोहों के लिए प्रसिद्ध है कल 115 करो में रचित बर्वे नायिका भेद वर्णन नायक नायिका भेद वर्णन पर लिखित हिंदी का प्रथम काव्य ग्रंथ है मंधना अष्टक में इन्होंने श्री कृष्णा और गोपियों की प्रेम लीलाओं का सरस चित्रण किया है

 धन्यवाद-

 

 


Read Full Blog...

  • Author:- kumarivanshika01232@gmail.com
  • Date:- 2026:01:19
  • 24 Views


मीराबाई


 "मैं आज आपको मेरा भाई के बारे में बताऊंगी " पीर की गायिका और कृष्ण की प्रेम दीवानी मीराबाई का जन्म सन 1498 ईस्वी में राजस्थान में मेड़ता के समीप चौकड़ी नामक गांव में हुआ था जोधपुर के संस्थापक राज जोधपुर की प्रमुख अटरिया एवं रतन सिंह की पुत्री थी बचपन में ही उनकी माता का स्वर्गवास हो गया था उनका पालन पोषण दादा की देखरेख से राज्य थर्ड पार्ट के साथ हुआ इनके दादा राम दूध दादाजी बड़े धा... Read More

 "मैं आज आपको मेरा भाई के बारे में बताऊंगी "

पीर की गायिका और कृष्ण की प्रेम दीवानी मीराबाई का जन्म सन 1498 ईस्वी में राजस्थान में मेड़ता के समीप चौकड़ी नामक गांव में हुआ था जोधपुर के संस्थापक राज जोधपुर की प्रमुख अटरिया एवं रतन सिंह की पुत्री थी बचपन में ही उनकी माता का स्वर्गवास हो गया था उनका पालन पोषण दादा की देखरेख से राज्य थर्ड पार्ट के साथ हुआ इनके दादा राम दूध दादाजी बड़े धार्मिक स्वभाव के थे जिनका मेरा के जीवन पर अत्यधिक प्रभाव पड़ा मेरा जब मात्र 8 वर्ष की थी तभी उन्होंने अपने मन में कृष्ण को पति रूप में स्वीकार कर लिया था उनकी भक्ति भावना के विषय में डॉक्टर राजेश्वर प्रसाद चतुर्वेदी ने अपने विचार व्यक्त करते हुए लिखा है- 20 वर्ष की अवस्था में ही मेरा विधवा हो गई और जीवन का लौकिक आधार छिन जाने पर अब स्वाभाविक रूप से उनका 80 मिशन ने अनंत प्रेम और अद्भुत प्रतिभार स्रोत गीत धारा लाल की ओर उमर पाड़ा मेवाड़ की राजशक्ति का घोर विरोध सहन करके सभी कासन को सहन करते हुए विश्व का प्याला पीकर भी उन्होंने श्री कृष्ण के प्रति अपने भक्ति भावना को आश्वासन ने बनाए रखा 

 मीरा का विवाह चित्तौड़ के महाराणा सांगा के सबसे बड़े पुत्र भोजराज के साथ हुआ था विवाह के कुछ समय बाद ही उनके पति की है सामाजिक मृत्यु हो गई इसका मेरा के जीवन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा क्योंकि वह तो पहले से ही भगवान कृष्ण को अपने पति रूप में स्वीकार कर चुकी थी मैं सदैव श्री कृष्ण के चरणों में अपना ध्यान केंद्रित रखती थी मीरा के इस कार्य से परिवार के लोग रुष्ट रहते थे क्योंकि उनका यह कार्य राज करने की प्रतिष्ठा के विपरीत था 

 मीरा के भजन नए गीतों से सच्चे प्रेम की पीर और वेदना का बिरहा रूप एक साथ पाया जाता है मेरा को पूरा संसार मिथ्या प्रतीत हुआ है इसलिए वह कृष्ण भक्ति को अपने जीवन के आधार के रूप में स्वीकार करती है भक्ति करते-करते मेरा सन 1546 में द्वारिका में कृष्ण की भक्ति पूर्ति में विलीन हो गई

 मीराबाई के जीवन का उद्देश्य कविता करना नहीं था उनके भजन और गीत संग्रह उनकी रचनाओं के रूप में जाने जाते हैं नरसी जी का मेरा में गुजरात के प्रसिद्ध भक्त कवि नरसी की प्रशंसा की गई है इनके फुटकर पदों में विभिन्न रंगों में रचित पद मिलते हैं मेरा पदावली में इनके पदों का संकलन है यही उनकी प्रसिद्ध का एकमात्र प्रकार स्तंभ है 

 कृष्ण भक्त मीरा के जीवन का संभल था इसलिए मैं कठिन से कठिन लौकिक कासन को शहर से जेल गई में स्पष्ट शब्दों में रहती है मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरा ना कोई मेरा के इस कथन में उनके कृष्ण प्रेम की सच्चाई है उनकी यही भक्ति भावना काव्य साधना के रूप में हिंदी साहित्य को प्रकाश में बनती है कृष्ण के प्रति इनका अन्य प्रेम दांपत्य जीवन के रूप में भी प्रकट हुआ यही कारण है कि उनके काव्य में श्रृंगार और शांत रस की धारा संगम के जल की भांति एक साथ बहती है मीरा के पदों में माधुरी का जो रूप मिलता है उसे भक्ति का सामान्य ज्ञान भी आनंद विभोर हो उठते हैं मीरा की भक्ति में सहजता सरलता और तन्यता का रूप एक साथी पाया जाता है मेरा के काव्य में कहीं भी पंडित दिए प्रदर्शन नहीं मिलता है मेरा के जीवन का उद्देश्य प्रेम भक्ति है संपूर्ण द्वारा अपने प्रियतम कृष्ण को पाना था काव्या सर्जन द्वारा यश प्राप्त करना नहीं 

 कार्य क्षेत्र - कवियत्री

  धन्यवाद


Read Full Blog...

  • Author:- kumarivanshika01232@gmail.com
  • Date:- 2026:01:17
  • 96 Views


कबीर दास


 मैं आज आपको संत कबीर दास के बारे में बताने जा रही हूं डॉ नरेंद्र के हिंदी साहित्य के अनुसार प्रसिद्ध मां समाज सुधारक और संत कवि कबीर दास का जन्म 1348 ईस्वी में हुआ था एक की वेदांती के अनुसार इनका जन्म वाराणसी में लहरतारा नामक स्थान पर एक विधवा ब्राह्मणी के गर्भ से हुआ था लोक लाज के पैसे उसने बच्चे को एक तालाब के किनारे फेंक दिया उनके जन्म के संबंध में यह दुआ प्रचलित है  चौदह पचपन साल गए... Read More

 मैं आज आपको संत कबीर दास के बारे में बताने जा रही हूं

डॉ नरेंद्र के हिंदी साहित्य के अनुसार प्रसिद्ध मां समाज सुधारक और संत कवि कबीर दास का जन्म 1348 ईस्वी में हुआ था एक की वेदांती के अनुसार इनका जन्म वाराणसी में लहरतारा नामक स्थान पर एक विधवा ब्राह्मणी के गर्भ से हुआ था लोक लाज के पैसे उसने बच्चे को एक तालाब के किनारे फेंक दिया उनके जन्म के संबंध में यह दुआ प्रचलित है 

चौदह पचपन साल गए चंद्रवार इक  ठाठ ठये

 जेठ सुदी बरसाइत को पूर्णमासी प्रगट भय

 कबीर का पालन पोषण नीरू नीमा नामक एक 1997 मुसलमान जुलाहा दंपति ने किया इस प्रकार कबीर में हिंदू मुस्लिम दोनों धर्म के संस्कार जन्म से ही आ गए कबीर की शिक्षा दीक्षा का कोई प्रबंध नहीं था वह साधु संतु और फकीरों के पास बैठकर ज्ञान प्राप्त करते थे उन्होंने "मासी कागज छोड़ नहीं कलाम करना नहीं हाथ " कहकर अपने को अनपढ़ बताया है कहते हैं कि इनका बचपन मंदिर में व्यतीत हुआ किंतु बाद में काशी आ गए मंगरा के विषय में एक ब्राह्मण अवधारणा को छुतलाने के लिए अपने अंत समय में यह पुणे मांग रहा आ गए थे 

 काशी के प्रसिद्ध संत रामानंद कबीर के गुरुदेव कहा जाता है कि रामानंद का शिक्षित प्राप्त करने के लिए यह अंधेरे अंधेरे प्राप्त कल गंगा घाट की सीढ़िया पर जाकर लेट गए रामानंद जब गंगा स्नान के लिए आए तो उनका पर कबीर के ऊपर रखा गया में राम-राम कहते हुए पीछे हट गए इसी को गुरु मंत्र मानकर कबीर ने रामानंद का शिष्यता ग्रहण किया कुछ लोगों ने ताकि से को कबीर का गुरु बताया है किंतु स्वयं ताकि से को उपदेश देने वाले कबीर उनके शिष्य नहीं हो सकते कबीर ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि मैं काशी में पैदा हुआ और मुझे गुरु रामानंद से ज्ञान प्राप्त हुआ

 बड़े होकर कभी अपने माता-पिता के कार्यों में हाथ बढ़ाने लगे और बच्चे समय में ईश्वर भक्ति करते तथा विभिन्न संप्रदाय के धर्माचार्य की संगति में रहते इससे उनके ज्ञान क्षेत्र का विस्तार हुआ कबीर का विवाह लोइ नामक एक कन्या से हुआ था जिस कमाल और कमाली नामक इनकी दो संतान उत्पन्न हुई कबीर का ग्रस्त जीवन सुख में नहीं था कुछ दिनों पश्चात उन्होंने अपनी पत्नी से संबंध विच्छेद कर लिया यह अपने पुत्र कमाल की गतिविधियों से भी चिंतित रहते थे क्योंकि वह ईश्वर भक्ति से विमुख रहता था 

 काशी में करने वाले सूरत प्राप्त करते हैं और मंदिर में करने वाले निराला प्राप्त करते ही सुधारना को निर्मल सिद्ध करते हुए कबीर अपना संपूर्ण जीवन काशी में बिताने के पश्चात मृत्यु के समय मुंगरा चले आए यही 120 वर्ष की आयु में इनका स्वर्गवास हो गया उनकी मृत्यु के संबंध में यह दुआ प्रचलित है

 संवत पंद्रह सौ पचहतर, किए मगहर को गौन 

 माघ सुदी एकादशी राहो पौन में पौन 

 इनका निधन 1518 ईस्वी में मंगरा में हुआ था उनके अंतिम संस्कार को लेकर हिंदू मुस्लिम में खूब विवाद हुआ क्योंकि हिंदू इनका दाह संस्कार करना चाहते थे जबकि मुसलमान अपनी परंपरा के अनुसार इन्हें दफनाना चाहते थे कहा जाता है कि जब इनके सबसे कफ़न उठाया गया तो सबके स्थान पर कुछ पुष्प रखे थे जिन्हें दोनों धर्मो ने अनुयायियों ने आधा-आधा बांट लिया 

 कबीर पढ़े-लिखे नहीं थे इसलिए इन्होंने किसी काव्य ग्रंथ की रचना नहीं की थी इनका अध्ययतम ज्ञान उच्च कोटि कथा समाज में व्यापक कुरीतियों एवं आठ मेंबरों पर इन्होंने खूब रहा किया धर्म के बाहरी आचार्य व्यवहारों तथा कर्मकांडों पर उनकी ली मात्रा भी आस्था न थी यह जब तब में विश्वास नहीं करते थे मूर्ति पूजा और जान आदि का इन्होंने ठक्कर विरोध किया व्यर्थ की रोटियां और परंपराओं के विरुद्ध इन्होंने समाज को जागृत किया विलेक्शन प्रतिभा के धनी कबीर वास्तव में उत्कृष्ट रहस्यवादी समाज सुधारक पाखंड के आलोचक तथा मानवता के पोषक थे

 कबीर क्योंकि अनपढ़ते रहता है उनके मुख्य से निकलने वाली अमृतवाणी को उनके शिष्यों ने लिपि व्रत किया इनके धर्म वास नमक शिष्य ने उनकी रचनाओं का संग्रह बीजक नाम से किया यह सखी संबंध रिमिनी तीनों भागों में विभक्त है सखी में कबीर का साक्षात ज्ञान है यह दोहा छंद से लिया गया है इसमें कबीर का जीवन अनुभाग्य आंतरिक निहित है डॉक्टर श्यामसुंदर दास ने सन 1928 ईस्वी में कबीर की संपूर्ण रचनाओं को कबीर ग्रंथावली नमक से नागरी प्रचारिणी सभा काशी से प्राप्त कराया


Read Full Blog...

  • Author:- kumarivanshika01232@gmail.com
  • Date:- 2026:01:17
  • 48 Views


रविंद्र नाथ टैगोर


साहित्य में नोबेल पुरस्कार से सम्मान आईटी टैगोर जी का जन्म एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था उनके पिता का नाम देवेंद्र नाथ टैगोर तथा माता का नाम शारदा देवी था उनके पिता तथा दादा अत्यंत संपन्न व्यक्ति होने के कारण राजश्री दत्त भारत के साथ जीवन व्यतीत करते थे उनके परिवार का समाज में अत्यधिक सम्मान था इस सम्मान के कारण लोग इनके दादा और पिता को ठाकुर का कर बुलाते थे यही ठाकुर शब्द अंग्रेजी के प्रभाव से टै... Read More

साहित्य में नोबेल पुरस्कार से सम्मान आईटी टैगोर जी का जन्म एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था उनके पिता का नाम देवेंद्र नाथ टैगोर तथा माता का नाम शारदा देवी था उनके पिता तथा दादा अत्यंत संपन्न व्यक्ति होने के कारण राजश्री दत्त भारत के साथ जीवन व्यतीत करते थे उनके परिवार का समाज में अत्यधिक सम्मान था इस सम्मान के कारण लोग इनके दादा और पिता को ठाकुर का कर बुलाते थे यही ठाकुर शब्द अंग्रेजी के प्रभाव से टैगोर बन गया घर में नौकरों की अधिकता और विलासिता के अत्यधिक साधनों के कारण इनका स्वतंत्रता पूर्वक घूमने तथा खेलने के अवसर प्राप्त न हो सके यह स्वयं को बंदी जैसा अनुभव करते हुए अत्याधिकाइन रहते थे

 टैगोर जी की प्रारंभिक शिक्षा बांग्ला भाषा में घर पर ही आरंभ हुई प्रारंभिक शिक्षा समाप्त होने के पश्चात इनका प्रवेश पहले कोलकाता के और रेडिएटर सेमिनार विद्यालय और फिर नॉर्मल विद्यालय में कराया गया विद्यालय के वातावरण में इनका मन नहीं लगता था अत इनका एकांत बहुत प्रिय था विद्यालय शिक्षा समाप्त करने के पश्चात उनके पिता ने बैरिस्टर की पढ़ाई के लिए इन इंग्लैंड भेजा किंतु यह बैरिस्टर की डिग्री पूरी किए बिना कोलकाता लौट आए

 रविंद्र नाथ टैगोर साहित्यकार विचारक देशभक्त और उच्च कोटि के दार्शनिक थे सरस्वती के इस महान आराध्यक का 7 अगस्त 1941 ई को निधन हो गया

 रविंद्र नाथ टैगोर विलक्षण प्रतिभा के धनी थे विद्यालय में रुचि न होने के बाद भी साहित्य के साथ इनका अत्यधिक लगाव था 8 वर्ष की अल्प आयु में इन्होंने पहली कविता लिखी और फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा गीतांजलि की रचना करेंगे विश्व कवि बन गए इसी कीर्ति के लिए इन्हें सन 1913 ईस्वी में साहित्य का सर्वाधिक प्रतिष्ठ नोबेल पुरस्कार प्राप्त हुआ इन्होंने साहित्य की निबंध काव्य कहानी उपन्यास नाटक आदि सभी मुख्य विधाओं में साहित्य रचना की साहित्य के साथ-साथ इन्होंने नृत्य संगीत चित्रकला एवं अभिनय में भी अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया साहित्य संगीत की कितनी ही नई शैलियां इन्होंने विकसित की आज कला एवं नृत्य संगीत में उनके द्वारा विकसित नहीं से लिया इन्हीं के नाम से जानी जाती है बांग्ला भाषा में उनके द्वारा लिखे गए 2000 से अधिक गीत रविंद्र संगीत के नाम से जाने जाते हैं और बांग्ला भाषाओं के द्वारा अत्यधिक रुचि के साथ सुने जाते हैं यह जितनी उच्च कोटि के साहित्यकार थे उतनी ही उच्च कोटि के अभिनेता नाटककार गीतकार संगीतकार चित्रकार और नृत्य कलाकार थे बंगाल में मौलिक लेखन के अतिरिक्त इन्होंने कितनी ही कृतियों का अंग्रेजी में अनुवाद भी किया भारत का राष्ट्रीय गान जन गण मन और बांग्लादेश का राष्ट्रीय गान अमार सोनार बांग्ला भी इन्हीं की विश्व प्रसिद्ध रचनाएं हैं विश्व में केवल इन्ही को दो रसों के राष्ट्रगान का लेखक होने का गौरव प्राप्त है टैगोर जी क्योंकि बहुमुखी प्रतिभा के धनी साहित्यकार थे अतः इन्होंने साहित्य की सभी प्रमुख विधाओं में साहित्य रचना की

 रविंद्र नाथ की  प्रमुख रचनाएं-

 काबुलीवाला, अनाथ,विद्या आदि (कहानी): गोरा, घरे,बैरे (उपन्यास): चित्रांगदा, राजा,डाकघर( नाटक ):संपत्ति,संस्कार,त्याग, अध्यापक (लघु कथा): गीतांजलि,निरुपमा,पूर्व भी बालक का आदि (काव्य )

 भाषा शैली: भाषा बंगाल तथा संस्कृत परी निष्ठाता शैली  चित्रात्मक वर्णनात्मक विवेचनात्मक और वैज्ञानिक 

 लेखन विद्या :-

 काव्य, कहानी, उपन्यास,पत्र, नाटक,लघु कथा

 धन्यवाद:-

 


Read Full Blog...

  • Author:- kumarivanshika01232@gmail.com
  • Date:- 2026:01:15
  • 83 Views


धर्मवीर भारती


हिंदी के यह सभी पत्रकार कवि कथाकार हैव नाटक का डॉक्टर धर्मवीर भारती का जन्म 25 दिसंबर सन 1926 ई को इलाहाबाद में हुआ था इन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय में मा एचडी की उपाध्याय प्रताप की बचपन से ही साहित्य में उनकी रुचि थी उनकी रचनाएं तत्कालीन समसामयिक पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित होने लगी इन्होंने कुछ समय तक साप्ताहिक पत्र संगम का संपादन भी किया तत्पश्चात इलाहाबाद विश्वविद्यालय में हिंदी के प्राध्या... Read More

हिंदी के यह सभी पत्रकार कवि कथाकार हैव नाटक का डॉक्टर धर्मवीर भारती का जन्म 25 दिसंबर सन 1926 ई को इलाहाबाद में हुआ था इन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय में मा एचडी की उपाध्याय प्रताप की बचपन से ही साहित्य में उनकी रुचि थी उनकी रचनाएं तत्कालीन समसामयिक पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित होने लगी इन्होंने कुछ समय तक साप्ताहिक पत्र संगम का संपादन भी किया तत्पश्चात इलाहाबाद विश्वविद्यालय में हिंदी के प्राध्यापक नियुक्त हुए वहां भी यह अधिक समय तक नहीं रहे साहित्य सेवा की प्रबल भावना ने इनको स्वतंत्र लेखन के लिए परिवर्तित किया और यह जीवन पर्यटन हिंदी साहित्य की विभिन्न विधियां और काव्य क्षेत्र में कार्य करते रहे इनका निधन 4 सितंबर 1997 में हुआ 

 भारतीय बहुमुखी प्रतिभा के धनी साहित्यकार थे इन्होंने हिंदी साहित्य के निबंध नाटक कथा उपन्यास और कविता इन सभी विधाओं में उत्कृष्ट लेखन क्या सफल संपादक और अनुवादक के रूप में भी एक ख्याति प्राप्त है आलोचना के क्षेत्र में यह प्राचीन रूढ़ियों पर प्रभाव करने के लिए प्रसिद्ध है

 इलाहाबाद के साहित्यिक परिवेश ने उनके जीवन को बड़ा प्रभावित किया वहां रहते हैं यह निराला पंत महादेवी वर्मा तथा डॉक्टर राजकुमार वर्मा जैसे महान साहित्यकारों के संपर्क में आए इन साहित्यकारों से इन्हें साहित्य सृजन की प्रेरणा प्राप्त हुई और उनकी साहित्यिक प्रतिभा में निखार आता चला गया देश की विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में इनके निबंध और कविताएं प्रकाशित होने लगी किस प्रकार यह एक यह सभी साहित्यकार के रूप में हिंदी साहित्य में प्रतिष्ठ हुए इन्होंने साहित्य की जिस भी विद्या का अपनी लेखनी से स्पर्श किया वह धन्य हो उठे उपन्यास के क्षेत्र में गुनाहों का देवता काव्य के क्षेत्र में कनुप्रिया एवं अंधा युग का कोई सानी नहीं यह निश्चित हिंदी साहित्य में इनका विविष्ट स्थान है उनके एक आलोचक के शब्दों में हम कह सकते हैं कि जीवन से निराश और विकृत मानस पर मृत्यु का मनोवैज्ञानिक अध्ययन प्रस्तुत करने आधुनिक वैज्ञानिकता से भरा क्रांत सभ्यता को चित्रित करने तथा स्थान स्थान पर अतीत के आश्रय मानवीयता के रंगों का गहरा करने में भारतीय जी को अप्रत्याशित सफलता मिली है उनकी साहित्यिक सेवाओं के लिए इन्हें भारत सरकार द्वारा पद्मश्री से सम्मानित किया गया है

 इस प्रकार स्पष्ट है की नई कविता तथागत साहित्य के विकास में तो इनका योगदान अभी समझनी है धर्म युग के संपादन में उनकी पत्रकारिता की उत्कृष्ट भी शब्द प्रमाणित है

 धर्मवीर भारती की प्रमु धन्यवादख रचनाएं-

" कनुप्रिया", " साथ गीत वर्ष", "ठंडा लोहा", "अंधा युग "

  धर्मवीर भारती के उपन्यास-

" गुनाहों का देवता", "सूरज का सातवां घोड़ा"

 कार्य क्षेत्र - अध्यापक, लेखक, पत्रकार नाटककार 

 धन्यवाद-

 


Read Full Blog...

  • Author:- kumarivanshika01232@gmail.com
  • Date:- 2026:01:15
  • 52 Views


काका कालेकर


राष्ट्रीय भाषा के आधार पर चालक उच्च कोटि के विद्वान और भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के निर्भीक सेनानी अनेक भाषाओं के ज्ञाता काका का कार्यकाल का जन्म एक संपन्न और प्रतिष्ठ परिवार में सन 1885 सभी को महाराष्ट्र के सतारा जिले में हुआ था उनकी मातृभाषा मराठी थी किंतु स्वाध्याय में रुचि होने के कारण इन्होंने हिंदी संस्कृत गुजराती बांग्ला अंग्रेजी आदि भाषाओं का अच्छा ज्ञान प्राप्त कर लिया  गांधी जी के स... Read More

राष्ट्रीय भाषा के आधार पर चालक उच्च कोटि के विद्वान और भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के निर्भीक सेनानी अनेक भाषाओं के ज्ञाता काका का कार्यकाल का जन्म एक संपन्न और प्रतिष्ठ परिवार में सन 1885 सभी को महाराष्ट्र के सतारा जिले में हुआ था उनकी मातृभाषा मराठी थी किंतु स्वाध्याय में रुचि होने के कारण इन्होंने हिंदी संस्कृत गुजराती बांग्ला अंग्रेजी आदि भाषाओं का अच्छा ज्ञान प्राप्त कर लिया

 गांधी जी के सानिया थीम में आकर काका का लेकर राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़ गए उनके जीवन पर गांधी जी के अतिरिक्त रविंद्र नाथ टैगोर तथा राजश्री पुरुष स्तोत्र दास ढक्कन के संपर्क का भी गंभीर प्रभाव पड़ा आता है इन्होंने अपना संपूर्ण जीवन राष्ट्रीय सेवा और जनकल्याण के कार्यों को समर्पित कर दिया दक्षिण भारत विशेष कर गुजरात में इन्होंने हिंदी का प्रचार पुरातन मन लगाकर किया यह हिंदी के प्रचार को राष्ट्रीय सेवा का एक अलग मानते थे इसके साथ ही उन्होंने प्राचीन भारतीय संस्कृति इतिहास भूगोल नीति एवं तत्कालीन समस्या के समाधान हेतु भी कार्य किया

 काका कालेकर जी ने शांतिनिकेतन में अध्यापक साबरमती आश्रम में प्रधानाध्यापक और बड़ौदा में राष्ट्रीय शाला के आचार्य पद पर भी कार्य किया सन 1934 में गुजरात विद्यापीठ में अध्यापन कार्य भी किया बाद में दिल्ली जाकर हिंदुस्तानी प्रचार सभा के कार्य में संकलन हो गए गांधीवाद के इस प्रचारक का 21 अगस्त सन 1981 ई को निधन हो गया

 स्वतंत्रता संग्राम सेनानी होने के कारण इन्होंने अनेक बार जेल यात्रा किए संविधान सभा के सदस्य भी रहे गांधीजी की मृत्यु के के प्रथम शचालक होने का गौरव भी इन्हें प्राप्त हुआ यह सन 1952 इस विशेषण 1997 ई तक राज्यसभा के सदस्य तथा विभिन्न आयोग के अध्यक्ष भी रहे राष्ट्रीय भाषा प्रचार समिति ने इनको गांधी पुरस्कार से सम्मानित किया भारत सरकार ने पद्म भूषण की उपाधि से इन्हें सम्मानित किया 

 काका साहब ने हिंदी और गुजराती दोनों ही भाषाओं में अपनी लेखनी चलाई इन्होंने अनेक गुजराती रचनाओं का हिंदी में अनुवाद किया साथ ही अनेक मौलिक रचनाओं भी हिंदी को प्रदान की इनका साहित्यकार रूप हिंदी में मुख्य निबंधकार संरक्षण लेखन जीवनी और यात्रा व्रत लेखक के रूप में उभरा हिंदी साहित्य को इन्होंने अनेक उत्कृष्ट यात्रा वृतांत भी प्रदान करें इनकी भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति में अटूट आस्था थी जिनका प्रभाव उनकी रचनाओं पर स्पष्ट दिखाई देता है गुजरात में हिंदी प्रसार का से काका साहब को ही दिया जाता है इन्होंने अनेक उच्च कोटि के निबंध लिखें 

 काका कालेकर की प्रमुख रचनाएं-

 "जीवन काव्य", "जीवन साहित्य"

 कार्य क्षेत्र- अध्यापक लेखक

 सम्मान-  गांधी पुरस्कार, पद्म भूषण 

 धन्यवाद-


Read Full Blog...

  • Author:- kumarivanshika01232@gmail.com
  • Date:- 2026:01:15
  • 56 Views


पंडित श्रीराम शर्मा


सुप्रसिद्ध राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और हिंदी बाड़मेर में शिकार साहित्य के प्रेम का पंडित श्रीराम शर्मा का जन्म उत्तर प्रदेश के मैनपुरी जिले के किस तरह गांव मकनपुर के निकट 23 मार्च सन 1892 ई को हुआ था यह बचपन से ही आत्मविश्वासी लीडर व साहसी थे बचपन में कितने ही सांप को मारने वाले यह बालक आगे चलकर विदेशी शेषनाग से झुन्झने में भी पीछे नहीं रहा उनके प्रारंभिक शिक्षा समीप के ही गांव मकनपुर म... Read More

सुप्रसिद्ध राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और हिंदी बाड़मेर में शिकार साहित्य के प्रेम का पंडित श्रीराम शर्मा का जन्म उत्तर प्रदेश के मैनपुरी जिले के किस तरह गांव मकनपुर के निकट 23 मार्च सन 1892 ई को हुआ था यह बचपन से ही आत्मविश्वासी लीडर व साहसी थे बचपन में कितने ही सांप को मारने वाले यह बालक आगे चलकर विदेशी शेषनाग से झुन्झने में भी पीछे नहीं रहा उनके प्रारंभिक शिक्षा समीप के ही गांव मकनपुर में हुई उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय में बा की परीक्षा उत्तरण की तट पर जाती है पत्रकारिता से जुड़ गए और विशाल भारत का संपादन करने लगे इसी के साथ इन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भाग लेकर देश सेवा की इनका घर स्वतंत्रता आंदोलन के क्रांतिकारियों का योजना स्थल था देश सेवा करते हुए इन्होंने अनेक जेल यात्राएं भी की साहित्य और मातृभूमि की सेवा करते हुए यह नेत्रिक योद्धा लंबी रूपनाता के भाषण 1967 ईस्वी में स्वर्गवासी हो गए 

 श्रीराम शर्मा ने अपना साहित्यिक जीवन एक कुशल पत्रकार के रूप में आभास किया इन्होंने विशाल भारत का संपादन कर पत्रकारिता के क्षेत्र में एक महान क्रांति को जन्म दिया इस पत्र का स्वतंत्रता आंदोलन में उल्लेखनीय योगदान रहा इसके अतिरिक्त दिनों में श्री गणेश शंकर विद्यार्थी के दैनिक पत्र प्रताप में शहर संपादक के रूप में कार्य किया इन्होंने शिकार साहित्य में विशेष ख्याति प्राप्त की इसका साहित्य राष्ट्रीय की भावना और देशभक्ति से उत्प्रोत साहस निर्भर करता और इस पूर्ति पर देने वाला था 

 श्रीराम शर्मा हिंदी में शिकार साहित्य के प्रसिद्ध लेखक रहे हैं प्रस्तुत हिंदी साहित्य में शिकार साहित्य का प्रणेता होने का से इन्हीं को दिया जाता है इनकी शिकार साहित्य सरस होने के साथ-साथ रोचक एवं रोमांचक पूर्ण है इन्होंने अपनी रचनाओं में वन  क्षेत्र का तो सजीव वर्णन किया ही है साथ ही वन्य जीवों के स्वभाव और विभिन्न परिस्थितियों में अनेक मनोभाव का भी सुंदर चित्रण क्या है पत्रक नेता के साथ ही उन्होंने शिकार साहित्य संस्मरण और जीवन लेखन की विधाओं में उल्लेखनीय कार्य किया सन 42 के संस्मरण और सेवाग्राम की डायरी आत्मकथमक शैली में लिखी गई उनकी प्रसिद्ध कृतियों है इनकी शिकार संबंधित प्रकाशित रचनाओं में शिकार प्राणों का सौदा बोलते प्रतिमा और जंगल के जीव विशेष रूप से उल्लेखनीय है राष्ट्रीय आंदोलन में सक्रिय भाग लेते रहने के कारण इन कृतियों मैं इनकी झलकियां अनायास आ गई है शिकार साहित्य से संबंधित लिखो में घटना विस्तार के साथ-साथ पशुओं के मनोविज्ञान का सम्यक परिचय देते हुए इन्होंने उन्हें पर्याप्त रोचक बनाने में सफलता प्राप्त की है इन्होंने ज्ञानवर्धक एवं विचार होते जग लेख भी लिखे हैं जो विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में समय-समय पर प्रकाशित होते हैं 

 पंडित श्री राम शर्मा की प्रमुख रचनाएं-

 "सेवाग्राम की डायरी," "सन 42 के संस्मरण"

 कार्य क्षेत्र - लेखक,पत्रकार

धन्यवाद-


Read Full Blog...

  • Author:- kumarivanshika01232@gmail.com
  • Date:- 2026:01:15
  • 537 Views


महादेवी वर्मा


 "मैं आज आपको एक महान कवयित्री के बारे में बताना चाहती हूं जिनका नाम महादेवी वर्मा है " पैदा की गाय का और आधुनिक युग की मीरा का कहीं जाने वाली छायावादी कवियों की व्रत चतुर्थी प्रसाद पंत निराला और महादेवी वर्मा में सम्मिलित महादेवी वर्मा का जन्म फर्रुखाबाद के एक शिक्षित और संभ्रांत परिवार में सन 1960 ईस्वी में उत्तर प्रदेश के फर्रुखाबाद में हुआ था उनके पिता गोविंद प्रसाद वर्मा भागलपु... Read More

 "मैं आज आपको एक महान कवयित्री के बारे में बताना चाहती हूं जिनका नाम महादेवी वर्मा है "

पैदा की गाय का और आधुनिक युग की मीरा का कहीं जाने वाली छायावादी कवियों की व्रत चतुर्थी प्रसाद पंत निराला और महादेवी वर्मा में सम्मिलित महादेवी वर्मा का जन्म फर्रुखाबाद के एक शिक्षित और संभ्रांत परिवार में सन 1960 ईस्वी में उत्तर प्रदेश के फर्रुखाबाद में हुआ था उनके पिता गोविंद प्रसाद वर्मा भागलपुर में एक विद्यालय में प्रधानाचार्य और नाना ब्रजभाषा के एक अच्छे कवि थे माता हम रानी वर्मा परम विदुषी महिला थी इन सभी के प्रभाव के कारण महादेवी वर्मा एक सफल प्रधानाचार्य और भाव कवियत्री बन गई उनकी माता मीरा और कबीर के पद बड़े भाव और ले के साथ गया करती थी वह स्वयं भी कविता किया करती थी माता के आचार्य विचार का महादेवी पर बड़ा प्रभाव पड़ा काव्य निपुणता इन्हें अपने नाना से ईश्वर के प्रति अनुराग अपनी मां से तथा सफल आचार्य के गुण पिता से प्राप्त हुए इस प्रकार यह श्रेष्ठ कवियत्री निर्गुण और अव्यक्त की परम शादी का विदुषी प्रधानाचार्य बन सकी 

 महादेवी वर्मा ने इंदौर में प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त करके क्राफ्ट वेट गर्ल्स कॉलेज इलाहाबाद में शिक्षा प्राप्त की इनका विभाग 11 वर्ष की अल्पायु में ही डॉक्टर स्वरूप नारायण वर्मा से हो गया सब सूर्य के विरोध के कारण उनकी शिक्षा में व्यवधान आ गया उनके देहब आसन के बाद इन्होंने पुनर शिक्षा प्रारंभ की ओर प्रयाग विश्वविद्यालय में मा संस्कृत की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तरण की इसके पश्चात प्रयाग महिला विद्यापीठ की प्रधानाचार्य नियुक्त हुई जहां सेशन 1965 ईस्वी में अवकाश ग्रहण किया इनकी साहित्य साधना अनवरत चलती रही है उत्तर प्रदेश विधान परिषद की मनोनीत सदस्य भी रही इनको नीरज पर शेख सरिया तथा यामाहा पर मंगला प्रसाद पुरस्कार भी प्राप्त हुई भारत के राष्ट्रपति ने इन्हें पद्मश्री की उपाधि से अलकरत किया सन 1983 ईस्वी में श्रीमती इंदिरा गांधी ने भारत भारतीय पुरस्कार प्रदान कर इन्हें हिंदी साहित्य की सर्वश्रेष्ठ कवियत्री घोषित किया उनकी कीर्ति या मां पर इंग्लैंड की तत्कालीन प्रधान मंत्री श्रीमती थिएटर ने इन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया कुमायूं विश्वविद्यालय ने इन्हें सन 1975 ईस्वी में डिलीट की मानक उपाधि से सम्मानित किया हिंदी साहित्य की इस परम साधिका का 11 सितंबर 1987 को आक्षिमक निधन हो गया महादेवी वर्मा की पारिवारिक पृष्ठभूमि काव्य में होने से इन्हें भी बचपन से ही काव्य अनुराग था उसे समय की प्रसिद्ध नई पत्रिका चांद में उनकी रचनाएं छपती थी बाद में इन्होंने चांद का संपादन भी किया इन्होंने सदियों से अपेक्षा नारी के कल्याणिकारी रूप को अपने काव्य में उतरकर पहचान दी उन्होंने देहरादून में उत्तरायण नमक साहित्य के आश्रम की स्थापना की उन्होंने प्रयाग में साहित्यकार संसद नामक संस्था की स्थापना करके हिंदी साहित्य के प्रसार प्रचार में महीने योगदान दिया

 महादेवी वर्मा की प्रमुख रचनाएं- निहार, रस्म,मिर्जा, संध्या,गीत, दीपशिखा, यामा 

 धन्यवाद-


Read Full Blog...

  • Author:- kumarivanshika01232@gmail.com
  • Date:- 2026:01:14
  • 59 Views


हजारी प्रसाद द्विवेदी


" मैं आज आपको एक महान कवि के बारे में बताने जा रही हूं जिनका नाम हजारी प्रसाद द्विवेदी जी है" हिंदी के मुंह धरने का कारण में आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी की गणना होती है इनका जन्म स्थान 1909 ईस्वी में उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के दुबे का छपरा गांव में हुआ था  उन्होंने आजीवन साहित्य साधना में लगे रहकर हिंदी साहित्य को अनेक उत्कृष्ट कर दिया प्रदान की उपन्यास निबंध विधाओं में इन्... Read More

" मैं आज आपको एक महान कवि के बारे में बताने जा रही हूं जिनका नाम हजारी प्रसाद द्विवेदी जी है"

हिंदी के मुंह धरने का कारण में आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी की गणना होती है इनका जन्म स्थान 1909 ईस्वी में उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के दुबे का छपरा गांव में हुआ था  उन्होंने आजीवन साहित्य साधना में लगे रहकर हिंदी साहित्य को अनेक उत्कृष्ट कर दिया प्रदान की उपन्यास निबंध विधाओं में इन्हें विशेषता सफलता प्राप्त हुई हिंदी साहित्य में उनके महत्वपूर्ण योगदान को रेखांकित करते हुए डॉक्टर द्वारिका प्रसाद सक्सेना ने कहा कि डॉक्टर द्विवेदी अपने अद्भुत रचना कौशल विविध विचार प्रदर्शन एवं द्विवेदी अपने अद्भुत रचना कौशल विविध विचार प्रदर्शन एवं अनुपम अभिव्यंजना में विद्या के कारण साहित्य के क्षेत्र में मुंह धनिया स्थान के अधिकारी है आचार्य द्विवेदी जी के पिता का नाम पंडित अनमोल द्विवेदी और माता का नाम श्रीमती ज्योति काली था उनके पिता ज्योतिष विद्या के महान ज्ञाता थिएटर में अपने पुत्र को भी ज्योतिषचर्य बनाना चाहते थे इसलिए शिक्षा का प्रारंभ संस्कृत से हुआ इन्होंने अपने पिता की इच्छा अनुसार इंटर करने के अपरांत काशी हिंदू विश्वविद्यालय से ज्योतिष तथा साहित्य में आचार्य की परीक्षा उत्तरण की सन 1940 ईस्वी में यह हिंदी एवं संस्कृति के अध्यापक के रूप में शांति निकेतन गए वहां अनेक वर्षों तक कार्य करते हुए यह गुरुदेव रविंद्र नाथ के निकट संपर्क में आ गए तत्व प्रांत यह काशी हिंदू विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में अध्यक्ष नियुक्त हुए कुछ समय तक आपने पंजाब विश्वविद्यालय में हिंदी विभाग अध्यक्ष के रूप में भी कार्य किया 

 द्विवेदी जी की साहित्य सेवा के परिणाम स्वरुप सन 1946 ईस्वी में लखनऊ विश्वविद्यालय ने इन्हें डिलीट की मानत उपाधि से सम्मानित किया और भारत सरकार ने सन 1957 ईस्वी में पद्मभूषण का अलंकरण प्रदान किया इन्हें इसकी आलोचनात्मक कृति कबीर पर मंगला प्रसाद प्रादेशिक भी प्रदान किया गया और साहित्य की आलोचना पर इन्हें इंदौर साहित्य सीमित ने स्वर्ण पदक देकर सम्मानित किया द्विवेदी जी की साहित्य चेतना निरंतर जागृत रही और वह आजीवन साहित्य सर्जन मैं लग रहे रोगाणावस्था के कारण इनका 72 वर्ष की आयु में अस्वस्थतहाट के कारण 17 में 1971 ई को देहब आसान हो गया द्विवेदी जी उच्च कोटि के निबंधकार उपन्यास आलोचक चिंतक और ओढ़कर्ता द बलिकाल में ही उन्होंने व्योम के शास्त्री से कविता लिखने की कला सीखनी आरंभ कीसेंस इसकी साहित्यिक प्रतिभा बिलसंता को प्राप्त होने लगी कवींद्र रवींद्र और बंगाल के साहित्य का उनके साहित्य पर अत्यधिक प्रभाव दृष्टि को चोर होता है सिद्ध साहित्य जैन साहित्य ऊपर ब्रिज साहित्य एवं भक्ति साहित्य को अपना आलोचनात्मक दृष्टि से आलोकित करके इन्होंने इन साहित्य का बड़ा उपकार किया

 हजारी प्रसाद जी के प्रमुख रचनाएं और उपन्यास -

' बाणभट्ट की आत्मकथा' 'पुनर्नवा का नाम दास का पौथा 'चारु चंद्र' आदि


Read Full Blog...

  • Author:- kumarivanshika01232@gmail.com
  • Date:- 2026:01:14
  • 177 Views



<--icon---->