Company Logo

partiksha

sonusaini@gamil.com
WEFRU3550291115202
Scan to visit website

Scan QR code to visit our website

Blog by partiksha | Digital Diary

" To Present local Business identity in front of global market"

Meri Kalam Se Digital Diary Submit Post


पं० प्रताप नारायण मिश्र


पंडित प्रताप नारायण मिश्र  प्रताप नारायण मिश्र का जन्म सन १८५६ ई० को उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले का बैजेगांव में हुआ था। मिश्रा जी के जन्म के कुछ दिनों बाद ही  इनके ज्योतिषी पिता पंडित संकटाप्रसाद मिश्र कनपुर आकर सपरिवार रहने लगे। यहीं पर इनकी शिक्षा दीक्षा हुई। पिता इन्हें ज्योतिषी पढ़कर अपने पैतृक व्यवसाय में ही लगाना चाहते थे। परंतु इनका मनमौजी स्वभाव उनमें नहीं रमा। इन्होंन... Read More

पंडित प्रताप नारायण मिश्र 

प्रताप नारायण मिश्र का जन्म सन १८५६ ई० को उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले का बैजेगांव में हुआ था। मिश्रा जी के जन्म के कुछ दिनों बाद ही  इनके ज्योतिषी पिता पंडित संकटाप्रसाद मिश्र कनपुर आकर सपरिवार रहने लगे। यहीं पर इनकी शिक्षा दीक्षा हुई। पिता इन्हें ज्योतिषी पढ़कर अपने पैतृक व्यवसाय में ही लगाना चाहते थे। परंतु इनका मनमौजी स्वभाव उनमें नहीं रमा। इन्होंने कुछ समय तक अंग्रेजी स्कूल मैं शिक्षा प्राप्त की, किंतु कोई भी अनुशासन और निष्ठा का कार्य, जिसमें विषय  की नीरसता के साथ प्रतिबंधता भी आवश्यक होती, इनके मोदी और फक्कड़ स्वभाव के विपरीत था; अतः यह यहां भी पढ़ न सके। घर में स्वाध्याय से ही इन्होंने संस्कृत, उर्दू, फारसी, अंग्रेजी, और बांग्ला पर अधिकार प्राप्त कर लिया। बहुमुखी प्रतिभा के धनी मिश्र जी का ३८ वर्ष की अल्पायु मैं सन १८९४ ई० में कानपुर में निधन हो गया। 

 


Read Full Blog...

  • Author:- sonusaini@gamil.com
  • Date:- 2026:01:18
  • 31 Views


सुमित्रानंदन पन्त


सुमित्रानंदन पन्त  सुमित्रानंदन पन्त जी का 20 में सन 1900 ई० अल्मोड़ा (उत्तराखंड) के निकट कौसनी ग्राम में हुआ था। इनकी प्रारंभिक शिक्षा ग्राम की ही पाठशाला में हुई। उनकी साहित्यिक सेवा के लिए भारत सरकारने इन्हें "पद्म भूषण" से सम्मान विभूषण किया। इनकी प्रमुख रचनाएं हैं वाणी, ग्रंथि, पल्लव, गुंजन आदि। सुमित्रानंदन जी का निधन 28 दिसंबर सन 1977 ई० को हुआ।      ... Read More

सुमित्रानंदन पन्त 

सुमित्रानंदन पन्त जी का 20 में सन 1900 ई० अल्मोड़ा (उत्तराखंड) के निकट कौसनी ग्राम में हुआ था। इनकी प्रारंभिक शिक्षा ग्राम की ही पाठशाला में हुई। उनकी साहित्यिक सेवा के लिए भारत सरकारने इन्हें "पद्म भूषण" से सम्मान विभूषण किया। इनकी प्रमुख रचनाएं हैं वाणी, ग्रंथि, पल्लव, गुंजन आदि। सुमित्रानंदन जी का निधन 28 दिसंबर सन 1977 ई० को हुआ।  

                 कविता 

              चिर  महान

जगजीवन में जो चिर महान, सौंदर्यपूर्ण औ सत्यवान, मैं उसका प्रेमी बनूं नाथ, जो हो मानव के हिट सामान, जिससे जीवन में मिली शक्ति,     छूटे भय , सशंय अंधभक्ति मैं वह प्रकाश बन सकूं, नाथ मिल जाए जिसमें अखिल व्यक्ति , पाकर प्रभु तुमसे अमर दान करने मानव का परित्राण ला सकूं विश्व में एक बार फिर से नवजीवन का विहान ।                                    

                            -सुमित्रानंदन पन्त।            

                                  

 

 


Read Full Blog...

  • Author:- sonusaini@gamil.com
  • Date:- 2026:01:17
  • 48 Views


ध्वनि (sound)


            ध्वनि (Sound) सभी जिओ तथा निर्जीवों द्वारा उतन्न अनेक प्रकार की आवाज जैसे चिड़िया का चहचाना, सड़क पर दौड़ने वाले वाहनों का बचाना, बरसात के मौसम में बादलों का गर्जना आदि, भाषाओं की वैज्ञानिक रूप ध्वनि कहते हैं। ध्वनि ऊर्जा का वह रूप है जो(Vibration) या विक्षोभ (disturbance) के कारण उत्पन्न होती है और ठोस , द्रव, गैस जैसे माध्यम से तिरंगे(Waves) के रूप... Read More

            ध्वनि (Sound)

सभी जिओ तथा निर्जीवों द्वारा उतन्न अनेक प्रकार की आवाज जैसे चिड़िया का चहचाना, सड़क पर दौड़ने वाले वाहनों का बचाना, बरसात के मौसम में बादलों का गर्जना आदि, भाषाओं की वैज्ञानिक रूप ध्वनि कहते हैं।

ध्वनि ऊर्जा का वह रूप है जो(Vibration) या विक्षोभ (disturbance) के कारण उत्पन्न होती है और ठोस , द्रव, गैस जैसे माध्यम से तिरंगे(Waves) के रूप में फैलती है। 

(1) कंम्पन -

जब कोई वस्तु अपनी मध्य स्थित के दोनों और इधर-उधर गति करती है तो उसकी गति दोलन, कंम्पन कहलाती है।

(2) आवर्तकाल- 

कंम्पन करने वाली वास्तु दोबारा एक कंम्पन     में लगे समय को आवर्तकाल (Perion) कहते हैं।

(3) आवृती (Frijuency)-

प्रति सेकंड में किए गए कंम्पनो की संख्या उसकी आवृती (Frijuency) कहलाती है इसका SI मात्रक हर्टज होता है। इसका संकेत HZ हैं। एक हर्टज आवर्ती $1 प्रति सेकंड के बराबर होती है। 

(4) आयाम (dimension)-

कंम्पन करती हुई वस्तु का अधिकतम विस्थापन आयाम कहलाता है।

(5) प्रबलता-

प्रबलता ध्वनि का वह गुण है जिससे ध्वनि तीव्र तथा मंद्र सुनाई देती है।

(6) तारत्व(Pitch)-

तारत्व ध्वनि का वह गुण है जिसके द्वारा हम मोती (भारी) या पतली (धीमी) ध्वनि मैं अंतर कर सकते हैं। उच्च तरत्व वाली ध्वनि की आवृती उच्च तथा निम्न तारत्व वाली ध्वनि की आवृति निम्न होती हैं।

 

 


Read Full Blog...

  • Author:- sonusaini@gamil.com
  • Date:- 2026:01:11
  • 36 Views


आइये ऊर्जा के बारे में समझे।


                   ऊर्जा  किसी वस्तु के कार्य करने की क्षमता को ऊर्जा कहते हैं। ऊर्जा का मात्रक वही होता हैं। जो कार्य का मात्रक है तथा कार्य भी भांति यह भी एक अदिश राशि है। MKS यध्दिति में ऊर्जा का मात्रक जूल है। किसी वस्तु की ऊर्जा की मैप उसे कार्य से की जाती हैं। जो वह सुनने ऊर्जा वली स्थिति आने तक कर सकती हैं। • ऊर्जा के रूप -  ऊ... Read More

                   ऊर्जा 

किसी वस्तु के कार्य करने की क्षमता को ऊर्जा कहते हैं। ऊर्जा का मात्रक वही होता हैं। जो कार्य का मात्रक है तथा कार्य भी भांति यह भी एक अदिश राशि है। MKS यध्दिति में ऊर्जा का मात्रक जूल है। किसी वस्तु की ऊर्जा की मैप उसे कार्य से की जाती हैं। जो वह सुनने ऊर्जा वली स्थिति आने तक कर सकती हैं।

• ऊर्जा के रूप - 

ऊर्जा के विभिन्न रूप हैं।

(1) यांत्रिक ऊर्जा-

वह ऊर्जा जो किसी वस्तु में यांत्रिक कार्य के कारण सचित होती है। यांत्रिक ऊर्जा कहलाती है। जैसे-गिरता हुआ पत्थर, खींचा हुआ तीर, घड़ी का स्प्रिंग, दबी हुई स्प्रिंग आदि से प्राप्त ऊर्जा यांत्रिक ऊर्जा है। यांत्रिक ऊर्जा दो प्रकार की होती है।

(1) गतिज ऊर्जा।

(2) स्तितिज ऊर्जा।

(2) ऊष्मीय ऊर्जा -

ईंधन चलने से ऊर्जा अथवा सौर विकरण से उत्पन्न ऊषा ऊष्मीय ऊर्जा कहलाती है जैसे  ईंधन,पेट्रोल, इंजन तथा डीजल इंजन से प्राप्त ऊर्जा ऊष्मीय ऊर्जा है।

(3) प्रकाश ऊर्जा-

वह ऊर्जा जिसके कारण हमें दिखाई देता है। प्रकाश ऊर्जा कहलाती है। जैसे-विद्युत बल्ब मोमबत्ती, सूर्य आदि प्राप्त ऊर्जा प्रकाश ऊर्जा है।

(4) रासायनिक ऊर्जा-

वह ऊर्जा जो किसी रसायनिक अभिक्रिया से प्राप्त होती है। रासायनिक ऊर्जा है ।जैसे- कोयला, पेट्रोल ,डीजल आदि से प्राप्त ऊर्जा रासायनिक ऊर्जा है।

(5) विद्युत ऊर्जा-

वह ऊर्जा जो विद्युत धारा द्वारा संचारित विद्युत ऊर्जा कहलाती है। जैसे विद्युत जनित्र ऊर्जा विद्युत ऊर्जा कहलाती हैं।

(6) ध्वनि ऊर्जा -

वह ऊर्जा जिसके कारण हमारे कान के पर्दों हिला कर सनते ध्वनि को सुन है जैसे लाउडस्पीकर से प्राप्त ध्वनि ऊर्जा हैं।

 


Read Full Blog...

  • Author:- sonusaini@gamil.com
  • Date:- 2026:01:10
  • 33 Views


The Little Girl


To the little gril he was be figure and avoideb. Every morning before going to work he came into her room and  gave her a casual  kiss, to which she responded with ''Goodbey , Father ''. And oh, there was a glad sense of relief whenshe heard the noise of the carriage growing fainter down the long road. In the evening when he came home she stood near the staircase and hear... Read More

To the little gril he was be figure and avoideb. Every morning before going to work he came into her room and  gave her a casual  kiss, to which she responded with ''Goodbey , Father ''. And oh, there was a glad sense of relief whenshe heard the noise of the carriage growing fainter down the long road. In the evening when he came home she stood near the staircase and heard his loud voice in the hall. ''Bring my tea into the drawing - room... Hasn't paper come yet? mother go and snd see if my paper's out there -and dringb me slippers .

''Kezia ,'' Mother would call to her ,'' if you'', a good girl you can come down and take off father 's boots .''slowly the girl would slip down the stairs , more slowly still across the hall, and push open the drawing -room door .By that time he had his spectacles on and looked at her over them in a way that was terrifying to the little girl. '' Well kezia, hurry up and pull off these boots and take them outside. Have you been a good girl today. '' '' I d-d-don't know, Father .'' You d-d-don,t know ?If you stutter like that mother will have to take you to docter.


Read Full Blog...

  • Author:- sonusaini@gamil.com
  • Date:- 2026:01:09
  • 105 Views


कार्य क्या है।


(1) कार्य की वैज्ञानिक संकल्पना  बल लगातार किसी वस्तु को बल की दिशा में विस्थापित करने की क्रिया को कार्य कहते हैं। अर्थात कार्य होने के लिए बल तथा बल की दिशा में विस्थापन दोनों आवश्यक हैं। एक नियत बल द्वारा किया गया कार्य  किसी वस्तु की एक निश्चित दूरी तक विस्थापित करने में किया गया कार्य वस्तु पर लगाए गए बल के अंनुक्रमा अनुपाती है।              &... Read More

(1) कार्य की वैज्ञानिक संकल्पना 

बल लगातार किसी वस्तु को बल की दिशा में विस्थापित करने की क्रिया को कार्य कहते हैं। अर्थात कार्य होने के लिए बल तथा बल की दिशा में विस्थापन दोनों आवश्यक हैं।

एक नियत बल द्वारा किया गया कार्य 

किसी वस्तु की एक निश्चित दूरी तक विस्थापित करने में किया गया कार्य वस्तु पर लगाए गए बल के अंनुक्रमा अनुपाती है। 

                कार्य ( W ) ×  बल  ( F )

अतः सामान बल लगातार किसी वास्तु को विस्थापित करने में किया गया विस्थापन के अनुक्रमानुपाती होता हैं।

          कार्य  ( W ) × विस्थापन ( d )

 कार्य का मात्रक 

कार्य का मत्रक = बाल का मात्रक × विस्थापन का मात्र अतः कार्य का मात्रक = I N×1ma-N-msi पद्धति में कार्य के मात्रक न्यूटन मीटर को सकेत J सब प्रदर्शित करते हैं। अतः 1J का कार्य उसे समय होगा जब 1N का बल लगातार वस्तु को बालक दिशा में 1m विस्थापित किया जाता है। अतः इसका प्रतिशत करते समय दिशा बताने की आवश्यकता नहीं होती हैं।


Read Full Blog...

  • Author:- sonusaini@gamil.com
  • Date:- 2026:01:09
  • 379 Views


एक समान गति तथा असमान गति


एक समान गति तथा आसमान गति  (Uniform motion and non-uniform motion) (1) एक समान गति(Uniform motion) जब कोई वस्तु समान अंतराल में निश्चित दिशा में समान दूरी तय करती है तब वस्तु की गति एक समान गति कहलाती है।एक समान गति में वस्तु का वेग नेट रहता है।  (2) असमान गति (non-uniform motion) जब कोई वस्तु सामान अंतरालों में आसमान दूरियां तय करती है, तब वस्तु की यह गति आसमान गति या परिवर्ती गति कहलात... Read More

एक समान गति तथा आसमान गति 

(Uniform motion and non-uniform motion)

(1) एक समान गति(Uniform motion)

जब कोई वस्तु समान अंतराल में निश्चित दिशा में समान दूरी तय करती है तब वस्तु की गति एक समान गति कहलाती है।एक समान गति में वस्तु का वेग नेट रहता है। 

(2) असमान गति (non-uniform motion)

जब कोई वस्तु सामान अंतरालों में आसमान दूरियां तय करती है, तब वस्तु की यह गति आसमान गति या परिवर्ती गति कहलाती है। असमान गति में वस्तु का वेग समय के साथ परिवर्तित होता है। 

चाल(Speld)

किसी वस्तु द्वारा एकांक समयांतराल(Time in terval) मैं चली गई दूरी को वस्तु की चाल कहते हैं। यह अदिश राशि है। इसे (V) से प्रतिशत किया जाता है।

वेग(Velocity)

किसी वस्तु द्वारा एकांक समय में निश्चित दिशा में चली गई दूरी अर्थात विस्थापन को उसका वेग कहते हैं। अर्थात किसी वस्तु द्वारा एकांक समयांतराल में तय की गई विस्थापन वस्तु का वेग कहलाता है। वेग को (V) से प्रदर्शित करते हैं। 

 

 

 

 


Read Full Blog...

  • Author:- sonusaini@gamil.com
  • Date:- 2026:01:08
  • 441 Views


दूरी तथा विस्थापन में अंतर


           दूरी (dispanc) किसी गतिमान वस्तु द्वारा किसी समय में तय की गई पथ की लंबाई को उसे वस्तु द्वारा चली गई दूरी कहते हैं। दूरी एक अदिश राशि है। दूरी का मात्रक SI प्रणाली में मीटर होता है। दूरी सदैव धनात्मक होती है। यह वस्तु के पद की आकृति पर निर्भर करती है। इसका मन विस्थापन के परिणाम के बराबर अथवा उससे बड़ा होता है।   विस्थ... Read More

           दूरी (dispanc)

किसी गतिमान वस्तु द्वारा किसी समय में तय की गई पथ की लंबाई को उसे वस्तु द्वारा चली गई दूरी कहते हैं। दूरी एक अदिश राशि है। दूरी का मात्रक SI प्रणाली में मीटर होता है। दूरी सदैव धनात्मक होती है। यह वस्तु के पद की आकृति पर निर्भर करती है। इसका मन विस्थापन के परिणाम के बराबर अथवा उससे बड़ा होता है।

  विस्थापन(Displacement)

वास्तु के अंतिम स्थिति तथा प्रारंभिक स्थिति के बीच की न्यूनतम दूरी को विस्थापन कहते हैं । विस्थापन एक सदिश राशि हैं। इसमें परिणाम और दिशा दोनों होते हैं। विस्थापन का मात्रक SI प्रणाली में मीटर होता है।

 


Read Full Blog...

  • Author:- sonusaini@gamil.com
  • Date:- 2026:01:06
  • 558 Views


गति एवं गति के प्रकार


            गति (Motion)  किसी वस्तु की स्थिति किसी स्थिर बिंदु की सापेक्ष समय के साथ-साथ परिवर्तन हो तब वह गति की अवस्था में कहलाती है तथा यह स्थिर बिंदु मूल बिंदु या निर्देश बिंदु कहलाती हैं।              गति के प्रकार  (1) सरल रेखीय गति          (Rectilinear Motion) जब को... Read More

            गति (Motion)

 किसी वस्तु की स्थिति किसी स्थिर बिंदु की सापेक्ष समय के साथ-साथ परिवर्तन हो तब वह गति की अवस्था में कहलाती है तथा यह स्थिर बिंदु मूल बिंदु या निर्देश बिंदु कहलाती हैं।

             गति के प्रकार 

(1) सरल रेखीय गति          (Rectilinear Motion)

जब कोई कण एक सरल रेखा में गतिमान होता हैं तो उनकी गति सरल रेखा गति कहलाती है और जब एक वस्तु एक सीधी रेखा मे गतिमान होती है तो उसकी गति स्थानांतरित गति कहलाती है।

उदाहरण 

सीधे चलती हुई ट्रेन की गति ।

(2) वृत्तीय गति(Cirular Motion)

जब कोई कण किसी वृत्ताकार मार्क पर गति करता है तो उसकी गति वृत्तीय गति कहलाती  हैं।

उदाहरण 

सूर्य के चारों ओर पृथ्वी की गति। 

(3) आसमान में गति

(Non-uniform motion) 

जब कोई वस्तु समय अंतराल में आसमान में दरी तय करती है तो उसे आसमान गति कहते हैं। 

उदाहरण 

एक मक्खी का उड़ना। 

(4) दोलन गति तथा कंपन गति

(Virbra ting motion)

जब कोई वस्तु किसी निश्चित बिंदु के इधर-उधर गति करती है। तो उसकी गति कंपन गति या दोलन गति कहलाती है। 

उदाहरण 

झूला झूलती हुई लड़की। 

(5) प्रक्षेप्य गति

(Praje ctic motion)

जब कोई वस्तु गरुत्वाकर्षण बल के अधीन गति करती है तो उसे गति को प्रक्षेप्य गति कहलाती हैं।

उदाहरण 

छत से फेंकी गई गेंद की गति , टॉप से छट्टी
 गले की गति।

(6) एक समान वृत्तीय गति 

जब कोई कम एक समान चार से वृत्तीय पथ पर गति करता है। तो कण की इस गति को एक समान वृत्तीय गति कहते हैं। 

उदाहरण 

घड़ी की सीई की नोक की गति।









 

 




      




 

 

 




 

 

 


Read Full Blog...

  • Author:- sonusaini@gamil.com
  • Date:- 2026:01:06
  • 660 Views


एपीथीलियमी ऊतक


एपीथीलियमी ऊतक  जंतु के शरीर को ढकने या बाहा रक्षा प्रदान  करने वाले ऊतक एपीथीलियमी ऊतक है।एपीथीलियमी शरीर के अंदर स्थिर बहुत से   अंगों और गुहिकाओ को ढखते है। यह भिन्न-भिन्न प्रकार के शारीरिक तंत्र को एक-दूसरे से अलग करने के लिए अवरोध का निर्माण करते हैं। त्वचा, मुंह ,आहारनलिया, रक्तवहनी नली        का अस्तर, फेफड़ों की फूपिका नली आदि   ... Read More

एपीथीलियमी ऊतक 

जंतु के शरीर को ढकने या बाहा रक्षा प्रदान  करने वाले ऊतक एपीथीलियमी ऊतक है।एपीथीलियमी शरीर के अंदर स्थिर बहुत से   अंगों और गुहिकाओ को ढखते है। यह भिन्न-भिन्न प्रकार के शारीरिक तंत्र को एक-दूसरे से अलग करने के लिए अवरोध का निर्माण करते हैं।

त्वचा, मुंह ,आहारनलिया, रक्तवहनी नली        का अस्तर, फेफड़ों की फूपिका नली आदि         सभी एपीथिलियमी ऊतक से बने होते हैं।          एपीथिलियमी ऊतक की कोशिकाएं एक दूसरे  से सटी होती है। और यह एक अनवरत परत   का निर्माण करती है। इन परतों के बीच चिपकाने वाले पदार्थ काम होते हैं। जो भी  पदार्थ शरीर    में प्रवेश करता है। या बाहर निकलता हैं, वह एपीथिलियमी कि किसी     परत से होकर गुजरता हैं।


Read Full Blog...

  • Author:- sonusaini@gamil.com
  • Date:- 2026:01:03
  • 27 Views



<--icon---->