1. कंप्यूटर सिस्टम की संरचना (Computer System Architecture)
कंप्यूटर की परिभाषा और उत्पत्ति
- उत्पत्ति: कंप्यूटर शब्द की उत्पत्ति लैटिन भाषा के शब्द 'कंप्यूट' (Compute) से हुई है, जिसका अर्थ है 'गणना करना'।
- परिभाषा: यह बहुत उच्च कंप्यूटिंग क्षमता वाला एक शक्तिशाली इलेक्ट्रॉनिक उपकरण है, जो कंप्यूटर प्रोग्राम (निर्देशों के सेट) के आधार पर अंकगणितीय और तार्किक संचालन (Arithmetic and Logical Operations) बहुत तेज गति और सटीकता से करता है।
कंप्यूटर प्रोसेसिंग चक्र के 5 मूल सिद्धांत (Processing Cycle)
दुनिया का कोई भी कंप्यूटर, स्मार्टफोन या मजबूत सर्वर इन्हीं 5 सिद्धांतों पर काम करता है:
2. सेंट्रल प्रोसेसिंग यूनिट (CPU) के आंतरिक भाग
सीपीयू को कंप्यूटर का मस्तिष्क (Brain) कहा जाता है। इसके मुख्य रूप से तीन भाग होते हैं:
- क) मेमोरी यूनिट (Memory Unit - MU): यह डेटा को प्रोसेसिंग से पहले या बाद में अस्थायी (Temporary) रूप से तब तक होल्ड करती है जब तक सीपीयू इसे प्रोसेस नहीं करता।
- ख) अंकगणित और तर्क इकाई (Arithmetic and Logic Unit - ALU): यह कंप्यूटर की सभी मूल गणितीय गणनाएँ (जैसे- जोड़, घटाव, गुणा, भाग) और तार्किक कार्य (Logical comparison - जैसे दो डेटा की तुलना करना) करता है。
- ग) कंट्रोल यूनिट (Control Unit - CU): यह कंप्यूटर सिस्टम के सभी घटकों के बीच कार्यों का समन्वय (Coordination) करती है। यह इनपुट यूनिट से डेटा लेकर प्रोसेसिंग यूनिट को भेजती है और प्रोसेस्ड डेटा को आउटपुट यूनिट तक पहुँचाती है।
3. कंप्यूटर के मुख्य आंतरिक हार्डवेयर (Internal Hardware)
- मदरबोर्ड (Motherboard): यह कंप्यूटर कैबिनेट के अंदर लगा मुख्य सर्किट बोर्ड (Circuit Board) होता है। प्रोसेसर, मेमोरी, हार्ड डिस्क आदि सभी महत्वपूर्ण घटक इसी से जुड़े होते हैं।
- प्रोसेसर्स (CPU Chip): मदरबोर्ड पर लगी लगभग एक इंच वर्गाकार इलेक्ट्रॉनिक चिप। यह अरबों ट्रांजिस्टर से बनी होती है। इसकी स्पीड (फ्रीक्वेंसी) को गीगाहर्ट्ज़ (GHz) में मापा जाता है।
- ग्राफिक्स प्रोसेसिंग यूनिट (GPU): इसे डिस्प्ले एडॉप्टर या गेमिंग कार्ड भी कहते हैं। सामान्य कंप्यूटर में ऑनबोर्ड जीपीयू होता है, लेकिन ग्राफिक्स डिजाइनिंग या गेमिंग जैसे भारी कार्यों के लिए उन्नत और समर्पित (Dedicated) उन्नत जीपीयू की आवश्यकता होती है।
- मुख्य मेमोरी (Main/Primary Memory): यह दो प्रकार की होती है:
- (i) रैंडम-एक्सेस मेमोरी (RAM): यह एक अस्थिर (Volatile) मेमोरी है। कंप्यूटर चालू रहने तक ही इसमें डेटा रहता है, बिजली बंद होते ही इसमें स्टोर जानकारी खो जाती है। (आधुनिक नवीनतम प्रकार: DDR4, SDRAM)।
- (ii) रीड ओनली मेमोरी (ROM): यह एक गैर-अस्थिर (Non-Volatile) मेमोरी है। कंप्यूटर बंद होने पर भी इसका डेटा नष्ट नहीं होता। इसमें कंप्यूटर को शुरू (बूट) करने वाले निर्देश जैसे BIOS (बेसिक इनपुट आउटपुट सिस्टम) या बूट प्रोग्राम स्टोर होते हैं। इसके प्रकार PROM, EPROM, EEPROM हैं।
4. सहायक उपकरण (Peripheral Devices)
ये उपकरण अतिरिक्त रूप से कंप्यूटर सिस्टम से बाहर से जुड़े होते हैं और इसके मूल घटक नहीं होते।
इनपुट डिवाइसेज (Input Devices)
यूजर से डेटा और निर्देश लेने के लिए उपयोग होते हैं:
- कीबोर्ड और माउस: ये मूल इनपुट उपकरण हैं। कीबोर्ड टेक्स्ट/संख्या डालने के लिए और माउस पॉइंटिंग डिवाइस के रूप में काम करता है।
- टचस्क्रीन: इसमें इनपुट और आउटपुट दोनों होते हैं (जैसे स्मार्टफोन, एटीएम)।
- स्कैनर: हार्डकॉपी (कागज के दस्तावेजों/तस्वीरों) को डिजिटल सॉफ्टकॉपी में बदलने के लिए।
- विशेष इनपुट उपकरण (Direct Input):
- MICR (मैग्नेटिक इंक कैरेक्टर रिकॉग्निशन): मुख्य रूप से बैंकों में चेक को तेजी से प्रोसेस करने के लिए।
- OCR (ऑप्टिकल कैरेक्टर रीडर): कागज पर लिखे या छपे टेक्स्ट को स्कैन करके सीधे एडिट करने योग्य डिजिटल फॉर्मेट में बदलने के लिए।
- OMR (ऑप्टिकल मार्क रीडर): पेन या पेंसिल से बने निशानों को पढ़ने के लिए (जैसे प्रतियोगी परीक्षाओं की उत्तर पुस्तिकाओं/Answer Sheets को जांचने में)।
- बारकोड स्कैनर: उत्पादों पर मौजूद बारकोड (जिसमें उत्पाद की आईडी और निर्माता की जानकारी होती है) को स्कैन करने के लिए。
आउटपुट डिवाइसेज (Output Devices)
- मॉनिटर: कंप्यूटर का मुख्य आउटपुट डिवाइस जो डेटा का विजुअल प्रतिनिधित्व दिखाता है। आधुनिक कंप्यूटरों में LCD (लिक्विड क्रिस्टल डिस्प्ले) और LED (लाइट एमिटिंग डायोड) स्क्रीन तकनीक का उपयोग होता है। मॉनिटर चुनते समय पिक्सेल, स्क्रीन आकार और रिफ्रेश रेट महत्वपूर्ण कारक हैं।
- प्रिंटर: इलेक्ट्रॉनिक डेटा को कागज पर हार्डकॉपी के रूप में प्रिंट करता है। इसके दो प्रकार हैं:
- इम्पेक्ट प्रिंटर: जो कागज पर स्याही के रिबन पर चोट (भौतिक प्रहार) करके छपाई करते हैं। ये बहुत शोर करते हैं (जैसे- डॉट-मैट्रिक्स प्रिंटर, लाइन प्रिंटर)।
- नॉन-इम्पेक्ट प्रिंटर: जो कागज के साथ सीधे भौतिक संपर्क में आए बिना शांत और तेज गति से काम करते हैं (जैसे- इंकजेट प्रिंटर और उच्च गुणवत्ता वाला लेज़र प्रिंटर)।
5. सेकेंडरी स्टोरेज डिवाइस (Secondary Storage)
यह गैर-वोलेटाइल (Non-Volatile) मेमोरी है, जिसका उपयोग बड़ी मात्रा में डेटा को स्थायी और दीर्घकालिक आधार पर बैकअप रखने के लिए किया जाता है।
- आंतरिक हार्ड डिस्क ड्राइव (Internal HDD): कैबिनेट के अंदर फिक्स होती है, क्षमता आमतौर पर 1 TB से 4 TB (या आधुनिक सिस्टम में 12 TB तक) होती है। इसकी औसत रोटेशन गति 7200 RPM (रेवोल्यूशन प्रति मिनट) अच्छी मानी जाती है।
- सॉलिड-स्टेट ड्राइव (SSD): यह पारंपरिक हार्ड डिस्क की तरह यांत्रिक (मैकेनिकल) भागों का उपयोग नहीं करती, बल्कि इसमें सिलिकॉन से बनी फ्लैश मेमोरी चिप्स होती हैं। यह सामान्य हार्ड डिस्क से कई गुना तेज होती है और कंप्यूटर के प्रदर्शन को बेहतर बनाती है।
- यूनिवर्सल सीरियल बस (USB) / फ्लैश ड्राइव: बहुत छोटा, पोर्टेबल और दोबारा लिखे जाने योग्य उपकरण (जैसे पेन ड्राइव), जो दो कंप्यूटरों के बीच डेटा ट्रांसफर के लिए सबसे अच्छा माध्यम है।
- क्लाउड स्टोरेज (Cloud Storage): आधुनिक तकनीक जहाँ डेटा इंटरनेट का उपयोग करके ऑनलाइन सर्वर पर सुरक्षित रखा जाता है (जैसे Google ड्राइव 15 GB और Apple iCloud 5 GB की मुफ्त क्षमता देते हैं)। सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट के लिए यह पसंदीदा स्टोरेज है क्योंकि डेवलपर्स सीधे क्लाउड एनवायरनमेंट में कोड रन कर सकते हैं।
6. डेटा प्रस्तुतीकरण और मापन इकाइयाँ (Data Representation)
डेटा और सूचना (Data and Information)
- डेटा (Data): शुरुआती रूप में बिना व्यवस्थित (Raw), असंगठित संख्या, संकेत या तथ्य हैं जिनका कोई सीधा अर्थ नहीं निकलता (जैसे केवल परीक्षा के अंक)।
- सूचना (Information): जब कच्चे डेटा को संसाधित (Process) और व्यवस्थित कर दिया जाता है ताकि वह लोगों के लिए उपयोगी और समझने योग्य बन जाए, तो उसे सूचना कहते हैं (जैसे रिपोर्ट कार्ड)।
कंप्यूटर मेमोरी मापन इकाइयाँ
डिजिटल कंप्यूटर डेटा को विद्युत संकेतों (Electrical pulses) के रूप में समझता है, जहाँ चालू (ON) स्थिति को '1' और बंद (OFF) स्थिति को '0' द्वारा दर्शाया जाता है।
- 1 बिट (Bit) = 0 या 1 (बाइनरी अंक, डेटा की सबसे छोटी इकाई)।
- 1 निबल (Nibble) = 4 बिट्स (आधा बाइट)।
- 1 बाइट (Byte) = 8 बिट्स (एक कैरेक्टर या अक्षर को दर्शाने की मूल इकाई)।
- 1 किलोबाइट (KB) = 1024 बाइट्स
- 1 मेगाबाइट (MB) = 1024 किलोबाइट
- 1 गीगाबाइट (GB) = 1024 मेगाबाइट
- 1 टेराबाइट (TB) = 1024 गीगाबाइट
- 1 पेटाबाइट (PB) = 1024 टेराबाइट
7. डेटा एन्कोडिंग और कोडिंग सिस्टम (Coding Systems)
जब हम कीबोर्ड पर कोई अक्षर (जैसे 'A') दबाते हैं, तो कंप्यूटर उसे सीधे नहीं समझता। कंप्यूटर इसे अपने समझने योग्य बाइनरी कोड (जैसे '1000001') में मैप करता है, इस तंत्र को एन्कोडिंग (Encoding) कहा जाता है। प्रमुख कोडिंग प्रणालियाँ निम्न हैं:
- बाइनरी कोडेड दशमलव (BCD): कंप्यूटिंग के शुरुआती दौर की प्रणाली है। इसमें प्रत्येक अंक को 4 बिट द्वारा दर्शाया जाता है और यह केवल 16 प्रतीकों (केवल दशमलव संख्या 0 से 9) को दर्शा सकती है। इसका विस्तृत 6-बिट प्रारूप 64 कैरेक्टर दर्शा सकता है।
- अमेरिकन स्टैंडर्ड कोड फॉर इंफॉर्मेशन इंटरचेंज (ASCII): यह कैरेक्टर प्रतिनिधित्व को मानकीकृत करने के लिए बनी। मूल ASCII कोड 7-बिट का होता है जिससे 128 कैरेक्टर दर्शाए जा सकते हैं। बाद में इसका 8-बिट संस्करण आया जो 256 कैरेक्टर प्रदान करता है। यह केवल अंग्रेजी भाषा के अक्षरों को सपोर्ट करता है।
- विस्तारित बाइनरी कोडेड दशमलव इंटरचेंज कोड (EBCDIC): यह 8-बिट की कोडिंग प्रणाली है जो 256 कैरेक्टर के उपयोग की सुविधा देती है। इसका उपयोग मुख्य रूप से आईबीएम (IBM) मेनफ्रेम कंप्यूटरों में किया गया था।
- यूनिकोड सिस्टम (Unicode): चूँकि पुरानी प्रणालियाँ हिंदी (देवनागरी), तमिल, चीनी, जापानी जैसी विभिन्न अंतरराष्ट्रीय भाषाओं के 256 से अधिक अक्षरों को प्रदर्शित नहीं कर सकती थीं, इसलिए यूनिकोड को विकसित किया गया। यह दुनिया की हर लिखित भाषा के हर कैरेक्टर को एक यूनिक कोड प्रदान करता है। इसके प्रमुख प्रकार हैं:
- UTF-8: परिवर्तनीय (Variable) लंबाई वाली एन्कोडिंग योजना, जिसमें एक कैरेक्टर के लिए न्यूनतम 8 बिट्स की आवश्यकता होती है। वेबसाइटों पर इसका व्यापक उपयोग होता है।
- UTF-16: परिवर्तनीय लंबाई योजना, जिसमें कैरेक्टर के लिए 16 बिट्स की आवश्यकता होती है।
- UTF-32: निश्चित (Fixed) लंबाई योजना, जहाँ प्रत्येक कैरेक्टर को दर्शाने के लिए हमेशा 32 बिट्स का उपयोग होता है।
8. संख्या प्रणाली (Number System)
संख्या प्रणाली कंप्यूटर में डेटा को प्रदर्शित करने की एक विधि है। इसे मुख्य रूप से दो भागों में बांटा जाता है:
- गैर-स्थितीय (Non-positional): जैसे रोमन अंक (I=1, V=5, X=10) जहाँ अंकों की स्थिति बदलने से उनका भार नहीं बदलता। यह अंकगणितीय गणनाओं के लिए प्रभावी नहीं है।
- स्थितीय (Positional): इसमें अंकों का मान उनके स्थान (Position) और संख्या प्रणाली के आधार या मूलांक (Radix/Base) पर निर्भर करता है।
कंप्यूटर विज्ञान में उपयोग होने वाली 4 प्रमुख स्थितीय संख्या प्रणालियाँ इस प्रकार हैं:
- बाइनरी संख्या प्रणाली (Binary Number System): इस प्रणाली का आधार (Base) 2 होता है। इसमें केवल दो अंकों, 0 और 1 का उपयोग किया जाता है। कंप्यूटर का आंतरिक सर्किट केवल इसी भाषा को समझता है। उदाहरण के लिए: (1011)₂।
- ऑक्टल संख्या प्रणाली (Octal Number System): इस प्रणाली का आधार (Base) 8 होता है। इसमें 0 से 7 तक के कुल आठ अंकों का उपयोग किया जाता है। ध्यान रहे, इसमें 8 या 9 अंक नहीं आ सकते। उदाहरण के लिए: (234)₈।
- दशमलव संख्या प्रणाली (Decimal Number System): इस प्रणाली का आधार (Base) 10 होता है। इसमें 0 से 9 तक के कुल दस अंकों का उपयोग किया जाता है। यह वही गणित है जो हम इंसान अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में इस्तेमाल करते हैं। उदाहरण के लिए: (512)₁₀।
- हेक्साडेसिमल संख्या प्रणाली (Hexadecimal Number System): इस प्रणाली का आधार (Base) 16 होता है। इसमें 0 से 9 तक की संख्याएँ और उसके बाद A से F तक के अक्षरों का उपयोग किया जाता है (जहाँ A का मतलब 10, B का 11, C का 12, D का 13, E का 14 और F का मतलब 15 होता है)। उदाहरण के लिए: (A4)₁₆।
*नोट: ऑक्टल प्रणाली में '8' या '9' अंक मान्य नहीं होते (जैसे 641₈ एक अमान्य संख्या है)। बाइनरी संख्या में सबसे बाईं ओर के बिट को MSB (Most Significant Bit) और सबसे दाईं ओर के बिट को LSB (Least Significant Bit) कहा जाता है। *
हेक्साडेसिमल संख्या प्रणाली के प्रमुख अनुप्रयोग:
- मेमोरी एड्रेस निरूपण: कंप्यूटर के लंबे 16-बिट या 32-बिट बाइनरी मेमोरी एड्रेस (जैसे 1100000011110001) को छोटे और आसानी से याद रखने योग्य रूप C0F1 में बदलने के लिए हेक्साडेसिमल का उपयोग होता है।
- वेबपेज पर रंग कोड (RGB): अधिकांश डिजिटल रंगों को 24-बिट बाइनरी कोड (लाल, हरे और नीले रंग के लिए 8-8 बिट) की आवश्यकता होती है। इसे याद रखना मुश्किल है, इसलिए इसे हेक्साडेसिमल नोटेशन के रूप में कॉम्पैक्ट लिखा जाता है। उदाहरण के लिए, शुद्ध लाल रंग को बाइनरी के बजाय आसानी से (FF, 00, 00) लिखा जाता है।
9. समस्या समाधान, एल्गोरिदम और फ्लोचार्ट (Problem Solving & Logic)
- सॉफ्टवेयर का उद्देश्य: जटिल समस्याओं को हल करना और असल जिंदगी के कार्यों को स्वचालित (Automate) करना है।
- डेवलपर का कौशल: एक डेवलपर के पास समस्या को समझने, आवश्यक इनपुट पर विचार करने और तार्किक चरणों (Logical steps) के द्वारा समाधान तक पहुँचने का कौशल होना चाहिए।
- बिल्डिंग ब्लॉक्स (Building Blocks): किसी भी प्रोग्राम को कोडिंग भाषा में लिखने से पहले दो प्रमुख बिल्डिंग ब्लॉक्स की मदद ली जाती है:
- एल्गोरिदम (Algorithm): किसी समस्या को हल करने के लिए लिखे गए तार्किक निर्देशों या चरणों का एक क्रमिक सेट (Step-by-step instructions)।
- फ्लोचार्ट (Flowchart): एल्गोरिदम या समस्या के समाधान के चरणों का एक चित्रात्मक या आरेखीय रूप (Graphical Representation)।
- प्रोग्रामिंग भाषा प्रतिमान (Programming Paradigm): प्रोग्रामिंग भाषा एक व्यवस्थित संकेत या भाषा है जिसका उपयोग कंप्यूटर को यह समझाने के लिए किया जाता है कि उसे क्या प्रक्रिया करनी है।
Sanjeev panday
Verified Author Expert@DigitalDiaryWefru